Tantra ki reality
तंत्र की परीक्षा
आखिर तंत्र की परीक्षा क्या है हम इसमें क्या। किसी वजह से लगे हुए। या बेवजह लगे हुए हैं। मुझे सब्र से काम लेना होगा इसको गहराई से समझना होगा।
इसमें कितनी वास्तविकता है तथा उसकी परीक्षा भी लेनी होगी सब्र से काम लेते हुए यह देखना होगा। किस तरह से मनीष को और उसकी वाइफ प्रीति को हम समझा सकते हैं अपने हिसाब से आखिर कब और कैसे उनसे मिलना हो और कब और कैसे अपनी बातों को समझाना होगा।
क्या इसके पीछे सांसारिक शक्तियां। प्राकृतिक शक्तियां काम करती हैं या नहीं यह देखना होगा ।इन सब में समय लगेगा और सब्र से काम लेना ही पड़ेगा । तथा यह चेक करना पड़ेगा कि आखिर कहां तक इसमें सच्चाई है।
तंत्र में,प्राकृतिक में,मंत्र में, तथा शक्तियों में क्या फर्क है। जादुई शक्तियां तो देखी नहीं पर एक अनुभूति जरूर है और इतिहास गवाह है कभी भी कोई जादुई शक्ति किसी फायदे के लिए काम में नहीं आई। आकस्मिक रूप से तत्काल फायदा या टेंपरेरी उपचार आगे अन्य बीमारियों को जन्म देता है ।
प्राकृतिक तरीके से किया गया उपचार परमानेंट किया गया उपचार हमेशा के लिए फायदेमंद होता है। अगर तंत्र और प्राकृतिक एक ही है तो फिर ठीक है। तंत्र का प्रयोग प्राकृतिक को समझने के लिए अथवा खुद को समझने के लिए ही होना चाहिए ।
संसार में रहते हुए दूसरों को समझना दूसरे के लिए कुछ भी करना वह प्राकृतिक और सांसारिक ही होना चाहिए।
आखिर झगड़े की वजह क्या थी उस झगड़े से किसको फायदा हुआ। फायदा तो मुझे खुद हुआ तथा उसकी जरूरत घर पर थी बहुत सी चीजें घर पर बिगड़ी थी बहुत सी चीजें खुद के दिमाग में बिगड़ी हुई थी जिनका सुधार होना जरूरी था। तो फिर झगड़ा नीति से ही क्यों हुआ क्योंकि तुम सिर्फ उसी झगड़े को ही वैल्यू देते। जिस झगड़े को वैल्यू दोगे उससे ही झगड़ा होना था। उस वजह से ही तुम दूसरी चीजों को समझ पाते तो झगड़ा तो जरूरी था उसके साथ जिसको तुमने वैल्यू दे रखी है।
अब जबकि जो सुधार होना था आंतरिक रूप से तथा बाहरी रूप से। उनमें सुधार हो चुका है ।उनको समझा जा चुका है तो फिर जिस से झगड़ा हुआ उससे झगड़ा भी समाप्त होना चाहिए।
अब बात करते हैं कि दिमाग ज्यादा पावरफुल है या प्रकृति की शक्तियां ज्यादा पावरफुल है । क्योंकि जो भी झगड़ा होता है वह तो दिमाग से होता है। जो भी फैसला होता है उसकी कल्पना पहले दिमाग में ही आती है । अगर शुरू से ही सारे फैसले सही किए जाए दिमाग सही दिशा में काम करें सही फैसले ले। तो कोई झगड़ा ही क्यों हो। पहले सारे फैसले गलत हुए उसके बाद सही करने के लिए प्रकृति को आना पड़ा तो इस तरह से जीवन अस्त-व्यस्त हो गया।
सारी परेशानियां जो है उसकी जड़ दिमाग ही है। जितने भी युद्ध हुए उसके पीछे दिमाग का पागलपन ही है । दिमाग का अहंकार ही है । तो दिमाग में इस तरह की बातें कहां से आती है। दिमाग में सही बातें ही क्यों नहीं आती। दिमाग में उटपटांग बातें ही क्यों जन्म लेती है उसकी क्या वजह है।
तो दिमाग ही सारी परेशानी की जड़ है। चाहे वह खुद से खराब हुआ हो चाहे किसी दूसरे ने खराब किया हो या फिर प्राकृतिक रूप से खराब हुआ। कुछ भी होने के लिए आपका दिमाग खराब होना या सही होना जरूरी है । तो इस तरह से आप जो भी दंड सह रहे हैं जो भी परेशानी आपको मिल रहा है वह आपके ही दिमाग की उपज है किसी और की नहीं है ।
इस तरह से जो दिमाग है वह क्या खुद के बस में हैं क्या खुद के हिसाब से काम करता है या उसमें कोई चिप लगी है। दिमाग किसी और के कंट्रोल में है । संभवत यह अनुभव किया गया बहुत सारी बातें दिमाग में प्राकृतिक रूप से अपने आप ही आ जाती हैं।
बहुत सारे विचार कल्पनाएं अपने आप से विकसित होते है । या फिर किसी और के कहने पर आपके दिमाग में विकसित किए जाते हैं । या फिर कोई भी वजह बन जाती है उन विचारों को दिमाग में विकसित करने की। उसमें चिप लगी हुई है ऐसा लगता है कि दिमाग में कोई चिप लगी है । और उसको कोई और ही बदल रहा है।
यह बात सच है कि दिमाग में चिप लगी हुई है तथा इसे या तो कोई बदल रहा है यह स्वता बदल रही है। क्योंकि जो दिमाग की गति आज है जो दिमाग की सोच आज है वह 1 साल बाद नहीं रहेगी तथा 5 साल बाद यह पूर्णता ही बदल जाएगी। तो इस तरह से दिमाग की चिप या तो कोई बदल रहा है या या फिर स्वयं बदल रही है।और यह सही दिशा में बदलेगी अथवा किसी गलत दिशा में बदलेगी इसका भी निर्णय कोई नहीं कर सकता । तो फिर इस समस्या को कैसे समझा जाए कि अगर यह चिप बदल रही तो सही दिशा में बदले गलत दिशा में ना बदले कुछ हद तक और बहुत सारे विद्वान कहते हैं यह सब कर्मों का फल है या तो इस जन्म में किए गए कर्म या पिछले जन्म में किए गए कर्म। और वह कर्म जीवन में उभरते हैं उन कर्मों का निर्णय होता है । उन कर्मों के हिसाब से ही। आपको फल मिलता है और फल देने वाला कोई और नहीं आपका अपना दिमाग है। क्योंकि दिमाग खराब होगा तो फल खराब आएगा दिमाग सही होगा तो फल सही है।
क्या दिमाग की इस परेशानी को प्राकृतिक रूप से समझा जा सकता है अथवा तंत्र के द्वारा समझा जा सकता है। प्रकृति और तंत्र में एक बैलेंस स्थापित करके चीजों को सही तरीके से समझा जा सकता है तथा खुद को बैलेंस करके खुद को रोका जा सकता है। इस तरह अगर हम खुद में बैलेंस कर ले खुद को रोक ले तो दूसरी होने वाली घटनाओं को एक हद तक। रोका जा सकता है या फिर खुद को उस में इंवॉल्व होने से रोका जा सकता है।
तंत्र और मंत्र की मेन शक्ति क्या है । उसकी मेन शक्ति यही है कि तंत्र और मंत्र के द्वारा ईश्वर की आराधना करके अपने इस जन्म के तथा पुराने जन्म के कर्मों को काटा जा सकता है। अपने विचारों को सुधारा जा सकता है दिमाग को बैलेंस में किया जा सकता है। प्रकृति को समझा जा सकता है । तथा कर्म बंधन को काटकर सही रास्ते का मार्ग ओपन हो जाता है। ऐसा ही रास्ते का ताला खुल जाता है।
तंत्र मंत्र की शक्ति से एनर्जी जनरेट होती है । या फिर कहे की शरीर में एक शक्ति। एक ऊर्जा उत्पन्न होती ही है । अब शक्ति अथवा उर्जा को सही रास्ते में आप लगाएंगे गलत रास्ते में लगाएंगे यह भी आपके दिमाग पर ही डिपेंड करता है।
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